महिला काव्य मंच इकाई हिसार द्वारा एक ऑनलाइन काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस गोष्ठी की अध्यक्षता मंच की अध्यक्ष सीमा शर्मा ने की और मंच संचालन पूनम मनचंदा ने किया। गोष्ठी की शुरुआत पूनम मनचंदा ने मधुर स्वरों में मां वीणापाणि की वंदना से की। नवोदित एवं युवा कवयित्री रिया नागपाल ने पिता के दर्द को महसूस करती हुई अपनी रचना ‘बेटी की विदाई में पिता रोता है, क्योंकि पिता के सीने में भी नर्म दिल होता है।’ मंच की अध्यक्ष सीमा शर्मा ने ‘बेरंग हुई जाती है तस्वीर मोहब्बत की, अब कोई रंग भरने को जी चाहता है।’ ‘मेरे नयना देखते हैं ख्वाब सतरंगी से, उन ख्वाबों को जीने को जी चाहता है’ सुनाकर सबकी खूब वाह वाही पायी। डॉ अंशुला गर्ग ने नारी सशक्तिकरण पर अपनी रचना ‘नारी शक्ति है, नारी ईश्वर की भक्ति है, नारी देवी स्वरूपा है, नारी अर्धांगिणी भी है’ प्रस्तुत कर सभी की तालियां पायी।

मंच की उपाध्यक्ष डिंपल सैनी ने अपनी बेहतरीन कविता ‘जब कभी सूरज का घोड़ा हिनहिनाता है, प्यासे होंठो पर मृगतृष्णा की कहानियां तैरने लगती है’ के माध्यम से कल्पना के असीम आकाश में उड़ान भरी। जानी मानी गजलकारा ऋतु कौशिक ने गहरे भाव लिए अपनी गजल ‘रोज सीने में नया खंजर चुभाना छोड़ दें, दफन यादों से कहो के याद आना छोड़ दें’ सुना सभी का दिल जीत लिया। मंच की महासचिव पूनम मनचंदा ने अपनी गजल ‘कैसा रातों रात नजारा बदला रिश्तों का, जो सहमा सहमा सा है नातों का ये मंजर, सोचो तो क्यों बदले हैं सारे ताने बाने, क्यों बदला बदला है हालातों का ये मंजर’ सस्वर सुना समां बांध दिया। कवयित्री डॉ. प्रज्ञा कौशिक ने अपनी शानदार कविता ‘चाय पर चर्चा’ और ‘आय पर खर्चा’ बुजुर्गों की महफिल का वो किस्सा न होते, न परियों की कहानी और न चांद की सैर की कोई तस्वीर जेहन में ही उतरती, गर आज ये किताबें न होतीं’ सुना किताबों के महत्व पर प्रकाश डाला और सराहना पायी। मंच की अध्यक्ष सीमा शर्मा ने सभी उपस्थित कवयित्रियों का आभार व्यक्त किया और एक शानदार गोष्ठी की बधाई दी।